Sadho@Lucknow, Banaras & Gorakhpur
February 28, 2009
A Sadho Yatra…
Text: Local organizers & the Sadho team.
Pics – courtesy & copyright: Nandan Saxena, Sidharth Pratap Singh, Shiwharsh Dwivedi, Manish, Archana Jha.
THE JOURNEY…
9 days
2200 kilometers…
cold gray foggy winter days
and many a road less travelled…
LUCKNOW
Date: December 27, 2008
Venue: Directorate of Information Auditorium
Hosts: Lamahi – a quarterly Hindi magazine, Vijay Rai, Sarvendra Vikram
लखनऊ
सूचना निदेशालय के प्रेक्षागृह में उस दिन तीन बजते-बजते काफी दर्शक आ गये थे। 3:30 तक कार्यक्रम शुरू न हो पाने से दर्शकों की बेचैनी साफ नजर आ रही थी और लोगों ने पूछना शुरू कर दिया था कि अभी कितनी देर है? अंततः जब हम शुरू करने ही वाले थे तो प्रोजेक्टर ने असहयोग कर दिया। खैर जैसे तैसे हम शुरू कर सके। फिल्मों का जो क्रम हमने सोचा था, आखिरी समय में उसे बदल कर दूसरा क्रम चुना। यह निर्णय तात्कालिक था लेकिन कारगर रहा। दिल्ली में साधो काव्य फिल्मोत्सव में दर्शकों की मनपसंद फिल्म का खिताब जीतने वाले
फिल्मकार सिद्धार्थ प्रताप सिंह और रोजी सिंह को औपचारिक रूप से सम्मानित करने का सुअवसर भी बन पड़ा।
प्रदर्शन के बाद दर्शकों ने सवाल किये। उनकी चिन्ता थी कि इन फिल्मों में कविता का पाठ साफ-साफ क्यों नहीं दिखता। कविता को पढ़ते समय हर बार एक नया पाठ बनता है। यह पाठकों के लिए एक जानी पहचानी स्थिति है, लेकिन इसी के साथ कविता की वाचिक परंपरा भी रही है और बड़े समूह में सुनने सुनाने की प्रथा। कार्यक्रम समाप्ति के बाद विजय राय अपने अनुभव बताते हैं जब सत्तर के दशक में उन्होने बनारस में कविता पोस्टरों की शुरूआत की थी और कविता का रंगमंच कहानी के रंगमंच के समानान्तर विकसित करने की कोशिश की गयी थी। कहानी का रंगमंच कहां से कहां पहुंच गया, लेकिन कविता का रंगमंच सशक्त नहीं हो सका।
दर्शक भी अपनी फिल्म बनाते होंगे। जब वे देखने जाते हैं तो उनके मन में फिल्म को लेकर एक अनुमान रहता होगा। कविता-फिल्मों के बारे में एक तरह का अनिश्चय होना स्वाभाविक ही है। जब कविता के पाठ या कंटेन्ट को लेकर पहले से कोई अनुमान न हो और पाठ के ट्रीटमेन्ट का कोई तय पैटर्न न हो। ऐसे में हर फिल्म दर्शकों को नये सिरे से देखने के लिए तैयार होने का आग्रह करती थी। – सर्वेन्द्र विक्रम
लखनऊ – २
साठवें दशक में कवि रघुवीर सहाय की प्रेरणा से देवराज अंकुर ने ‘कहानी का रंगमंच’ और विजय सोनी, प्रशान्त खिरवाणकर, विजय राय ने ‘कविता का रंगमंच’ का विकास किया था। संप्रेषणीयता के संकट से जटिल होने के कारण कविता का रंगमंच उस तरह से विकसित ना हो सका जिस तरह कहानी का रंगमंच हुआ। अवधारणा यह थी कि कहानी और कविता के कथ्य और विधि को बिना बदले उसका प्रसारण किया जाए। विजय राय ने १९७२ में कविता पोस्टर की शुरूआत की थी जिसका देखा देखी भोपाल, पटना, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, इलहाबाद और नए शहरों में भी इस तरह के आयोजन होने शुरू हो गए।
साधो ने जिस तरह से कविताओं को दृश्य में तब्दील कर इसे आम जन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है वह साधुवत्व का पात्र है। मुझे उम्मीद है कि भविष्य में साधो और अधिक व्यवस्थित तरीके से सार्थक और ऐतिहासिक काम करेगा। मुझे लगता है कि मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, धूमिल, रघुवीर सहाय वगैरह की लम्बी कविताओं को लेकर तेजस्वी युवा फिल्ममेकर के साथ साधो को कार्य करना चाहिए।
लखनऊ में आयोजित साधो काव्य फिल्मोत्सव बहुत ही लोकप्रिय रहा जिसकी सराहना स्थानीय बुद्धिजीवियों ने की। उम्मीद है कि जल्द ही एक और कविता फिल्म फेस्टिवल लखनऊ वासियों को देखने को मिलेगा। – विजय राय
BANARAS
Date: December 30, 2008
Venue: Arts Faculty Auditorium, BHU
Hosts: Women’s Studies Centre – Banaras Hindu University, Shubha Rao & Sadanand Shahi
.
.
.
बनारस
(स्थानीय आयोजक को एक दर्शक के पत्र के अंश) 
डा. शाही अंकल
आपने फिल्में देखने के लिए बुलाया और फिल्मों का विषय कुछ कविता से सम्बन्धित था, तो मैं बड़ा बेमन से वहाँ पहुँचा। पर पहली फिल्म देखते ही मैं समझ गया कि आगे के दो घन्टे बहुत मजेदार बीतने वाले हैं।
मुझे सबसे अच्छी फिल्म लगी बुडापेस्ट जो बिली कॉलिन्स की कविता पर बनी हुई फिल्म थी।
साधो के क्यूरेटर फिल्म शुरू होने से पहले फिल्म के बारे में कुछ बातें समझा देते थे, जिससे उसे समझने में और भी मदद मिलती थी। बुडापेस्ट को समझाते हुए उन्होंने बताया कि कोई लेखक अपनी बैठक में बैठे बड़ी देर से कोई उपन्यास लिखे जा रहे थे और अचानक फफक फफक कर रो पड़े, उनकी पत्नी के वजह पूछने पर उन्होंने कहा कि मेरे उपन्यास का नायक मर गया, मैं उसे मारना नहीं चाहता था। कुछ ऐसे भाव मन में उठते जाते हैं लेखक के जिनकी धारा में बहते हुए लेखक रचनाकर्म करता जाता है। वो कभी-कभी खुद नहीं जानता कि अगला शब्द क्या होगा और कहानी का अगला मोड़ क्या होगा। वो पूरा भावजगत जिसमें वो डूबता उतराता रहता है, वही भावजगत, वही भावधारा उससे अपने आप ही सबकुछ लिखवाती जाती है। बुडापेस्ट के फिल्मांकन में देखा कि एक हाथ है कलम पकड़े हुए जो कि बड़ी तेजी से कुछ लिखता जा रहा है और एक बार तो कलम उसके हाथ से छूटकर खुद ही लिखने लगती है। वो कलम ही उसकी भावधारा है जो उसे बहाते हुए रचनाकर्म कराती है। 
इस फिल्म को देखने के बाद मेरे अन्दर बड़ी उत्कट अभिलाषा हुई कि ऐसे ही कुछ भाव मेरे अन्दर भी आते और मैं भी कुछ लिखता।
रचनाएँ करने की ऐसी शक्ति अगर जागे तो फिर क्या बात है, जीवन आनन्द से भर जाएगा। इतनी अच्छी फिल्म मैं आपकी वजह से ही देख पाया। इसलिए बस आपको धन्यवाद देने के लिए पत्र लिख रहा हूँ। – परिमल प्रधान
.
GORAKHPUR
Date: January 1, 2009
Venue: Hotel Vivek
Hosts: Premchand Sahitya Sansthan, Expression Gorakhpur Film Society, Manoj Singh & Vivekanand Tripathi
एक्सप्रेशन-गोरखपुर फिल्म सोसाइटी का गठन वर्ष 2005 में हुआ था और इसके आयोजनों से गोरखपुर के सिने प्रेमी सिनेमा की कई विधाओं फीचर फिल्म, डाक्यूमेन्ट्री फिल्म, एनीमेशन फिल्म व शार्ट फिल्मों से परिचित हुए थे। लेकिन जब हमने यह घोषणा की कि नये वर्ष की पहली शाम हम काव्य फिल्म उत्सव का आयोजन कर रहे हैं तो सिनेमा की इस नयी विधा को जानने के लिए लोग उत्सुकता के साथ सम्पर्क करने लगे। आयोजकों के लिए भी यह आयोजन काफी उत्सुकता का विषय था।
साधो की टीम से बातचीत और साधो की वेबसाइट देखने से जो जानकारी मुझे मिली उसे मैने लोगों से साझा किया फिर भी कार्यक्रम शुरू होने तक लोग इसके बारे में और जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहे। आयोजन स्थल में करीब 90 लोगों की बैठने की व्यवस्था थी। कई दिन से काफी ठंड हो रही थी। एक जनवरी की शाम ठंड और बढ़ गयी और सर्द हवाएं चलने लगीं। हमें उम्मीद थी कि 50-60 लोग आएंगे लेकिन जब कार्यक्रम शुरू किया तो सभी कुर्सियां भर गयी और अतिरिक्त कुर्सियां लानी पड़ीं। इसके बावजूद 10-15 लोगों को खड़ा रहना पड़ा।
दर्शकों में व्यास सम्मान से सम्मानित सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रो परमानंद श्रीवास्तव, गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो शांता सिंह, गोरखपुर विश्वविद्यालय के आर्ट फैकेल्टी के डीन प्रो एके सक्सेना, साइन्स फैकेल्टी के प्रो जेपी चतुर्वेदी, रंगकर्मी आरिफ अजीज लेनिन, फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ, कवयित्री डा रंजना जायसवाल के नाम उल्लेखनीय है।
सबने काव्य फिल्मों को बड़े ही मनोयोग से देखा। फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ ने टाइगर फिल्म को दुबारा देखने की इच्छा जतायी तो वाट वाटर वीट को दर्शकों के अनुरोध पर दो बार दिखाया गया।
मशहूर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता अपनी बिटिया के नाम एक कविता पर आधारित काव्य फिल्म को देखने के बाद प्रो परमानन्द श्रीवास्तव ने कहा कि फिल्म में कविता पाठ फिल्मकार सिद्धार्थ की आवाज में है। उनकी आवाज बहुत कुछ कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की आवाज से मिलती है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना गोरखपुर जिले से सटे जनपद बस्ती के रहने वाले थे। उनकी कुआनो की बाढ कविता यहां के लोगों को बहुत पंसद है। उनकी कविता पर आधारित फिल्म को लोगों ने काफी अपनेपन से देखा।
दर्शक काव्य फिल्मों को देखने और इसके बारे में जानकारी दे रहे क्यूरेटर की बातों में इतने खोए थे कि एक-दो दर्शकों की मोबाइल की घंटियों ने उन्हें परेशान कर दिया। एक युवा दम्पति ने खड़े होकर मोबाइल को स्विच आफ करने की अपील की और एक बार फिर से रेन आन द बैटल फील्ड देखने की इच्छा जाहिर की।
जितेन्द्र रामप्रकाश की आवाज और प्रस्तुति से नरेन्द्र मिश्र प्रभावित दिखे तो गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के सदस्य साधो के तकनीकी सलाहकार सीपीएस तोमर की तकनीकी टिप्स से।
इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए संजय आर्य 80 किलोमीटर की यात्रा तय कर आए और उसी रात अपने कस्बे सलेमपुर लौटे। कार्यक्रम खत्म होने के बाद गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के सदस्य मृत्युंजय विशारद ने अपने कस्बे रूद्रपुर की प्रसिद्ध मिठाई बालूशाही पेश की और देखते ही देखते डिब्बा खाली हो गया।कुछ दर्शक निराश थे कि कार्यक्रम जल्दी खत्म हो गया जबकि वह देर रात तक फिल्म देखने की आशा से आए थे। – मनोज सिंह
.
AND IN THE END…
And for the three of us from the original group of fourteen, who travelled the entire stretch by road, the best part of the journey came in the end.
Our Sadho friend Pratap Somvanshi, who along with his friends at various cities helped make this tiring road-journey a smooth and comfortable one, remarked, “Sadho would go to Banaras and not to Maghar – how can that be!”
Banaras – one of the most ancient living cities in the world; the hub of culture, religion & arts for centuries; the place where nearly 600 years ago, the Saint Poet Kabir waged a struggle against fundamentalism.
… And Maghar – a small sleepy nondescript village along the road from Gorakhpur to Basti, the village where Kabir lived for years, where his legacy was shaped, and where now his last remains are.
There stood two simple similar looking structures marking the final resting place of Kabir, in accordance with the faith of two different religions – A mazar managed by the Muslims and a samadhi taken care of by the Hindus… a true symbol of harmony, humanism & Kabir’s message.
That evening, as we bowed in obeisance to that great poet, philosopher, revolutionary & saint… we found our souls cleansed, our spirits inspired and the foggy roads ahead – suddenly, miraculously clear…!
















Recent Comments